Wednesday, 15 March 2017

भेड़चाल ..वूमेंस डे की

"बंद कर  डाले थे मैंने अपने whatsapp के सारे ऑटोमेटिक डाउनलोड ! अब ना ही कोई इमेज, ना वीडियो ,ना gif ...
 आज वूमेंस डे बीते  ठीक एक हफ्ता हो गया है सोचती हूं 8 मार्च को आए हुए सोशल मीडिया तूफान* के बारे में....
8 मार्च के आने से पहले से ही शुरू हुआ था स्त्री सशक्तिकरण के दिखावे का चलन, मुझे अंदर तक चिढ़ा डालता था|  हर पोस्ट में स्त्री का गुणगान गाया जा रहा था ...   उस की सहनशक्ति, ममता, शालीनता की दुहाई दी जा रही थी !  हजारों शॉर्ट फिल्में अचानक ही facebook , twitter और whatsapp पर अवतरित हो गई | बाढ़ सी आ गई ऐसी पोस्ट की !
और 8 मार्च बीतते ही सब अचानक खत्म.... whatsapp पर एक पोस्ट आई थी "अगर यह दिन महिला दिवस है तो क्या होता है रोज महिलाओं के लिए ?" इस बात का महिला दिवस मनाने वाली महिला ने जवाब दिया कि यह दिन कर्मठ ,स्नेही, महिलाओं को सम्मानित करने का है  |  
मुझे तो झल्लाहट होती रही कि दिनभर सारी महिलाएं एक दूसरे को मैसेज भेज भेज कर वुमंस डे विश करती रही, फालतू फॉर वर्ड्स का तामझाम | पर फर्क कुछ नहीं |  रोना तो वह भी रोती रही ,बट फिर भी हैप्पी वूमंस डे !
 कोई इस दिन बाहर लंच करके खुश रहा, कोई मूवी देख कर , तो कोइ गोलगप्पे खा कर ही  अपनी आजादी का जश्न मना कर खुश रहा  |  दिन भर यही सब..... और 9 तारीख को जैसे सोशल मीडिया पर यह तूफान थम सा गया! लेकिन रुकिए....... अभी बहुत से त्यौहार और फलाने डेज आने को है ....अब फिर से यही सब नए सिरे से शुरू  हो चुका है..... त्योहारों और उसके बाद तक त्योहारों और उसके महत्व  पर जोक्स  बनेंगे  और  क्लिक्स , शेयर और फॉरवर्ड  के खेल में कंपनियां  दीवाली मनाएंगी |
  आपको नहीं लगता कि आज के दौर में हर त्यौहार, हर रिश्ते , हर भगवान और हर चीज का बाजारीकरण हो चुका है ? दो दशक पहले हम ग्रीटिंग कार्ड्स के लिए कहते थे , आर्चीज,हॉलमार्क आदि कंपनीज पर रिश्तो के बाजारीकरण का इल्जाम लगता था | पर अब देखा जाए तो रिश्तो , तीज-त्यौहारों के बाजारीकरण की सारी सीमाएं टूट चुकी हैं | हर उस बात पर जोक बन जाते हैं , जो बेहद संजीदा मानी जाती थी |   पर आज ना  ही किसी बात का कोई महत्व है या ना कोई संजीदगी ! हम अपनी भावी पीढ़ी को किस ओर ले जा रहे हैं ????
  Pure commercialisation of everything ! 


  आज बच्चा भी पैसों और बाजार की के महत्व को समझने लगा है | भावनाओं का मतलब उसे बोल कर समझाना पड़ता है |

 अच्छा,जरा पता लगाएं कि क्या सारी औरतों के पतियों ने अपनी पत्नियों को वूमेंस डे पर विश किया?
और अगर किया भी होगा,तो औरत की महानता गिनाने और पूर्वज महिलाओं की दयनीय स्थिति पर तरस खाने के अलावा, कोई और सार्थक कदम उठाया ??? अपने अंदर बदलाव लाने का संकल्प मात्र ही किया क्या? 

मुझे मेरे कई पुरुष सहकर्मियों ने महिला दिवस की बधाई दी | सच कहूं , तो समझ में नहीं आया कि react कैसे करूं उनके सामने ! ऐसे लगा मानो मैं अबला से सबला बन चुकी हूं और इसी बात की मुझे बधाई दी जा रही है ...महसूस हुआ की मेरे समाज की कितनी ही औरतें अबला जीवन जी चुकी है और इस संघर्ष में साथ दे रहा है यह महिला दिवस |  लेकिन आज भी अगर आप अपने surroundings में देखें , तो हजारों अबलाए आसानी से दिख जाएंगी जो एक दूसरे को हैप्पी वूमेंस डे विश कर रही हैं .. सब कर रहे हैं इसलिए करना है ....बिना दिमाग लगाए ..वही भेड़चाल........बेबात.... बेमतलब....

 महिला दिवस मनाना ही है तो उन महिलाओं को सबसे पहले खुद का सम्मान करना सीखना होगा ..... औरत को औरत की ही दुश्मन बनने से रोकना होगा और......  बाकियों को अगर वाकई में महिला दिवस विश करना है तो महिलाओं से अपेक्षाएं छोड़िए ..सिर्फ उनसे ही आदर्श बनने , त्याग की मूर्ति बनने की कामना मत कीजिए..... एक पत्नी के सफल होने का सारा श्रेय ,उसके पति को ही ही मत दे डालिए, वह भी सिर्फ इसलिए कि उसने उसे इतनी आजादी दी | बल्कि उसकी सफलता को उसके परिश्रम को दीजिये |  मां के सारे त्याग को सिर्फ सलाम मत कीजिए... बल्कि उसके दुखों को , जिम्मेदारियों को कम करने का प्रयास करिए ...औरत के मल्टीटास्किंग होने का गुणगान मत गाइए,..... बल्कि खुद भी उसके साथ खड़े होकर उसका बोझ बांटिए |  उसे भी आलसी,.. लापरवाह,..मस्त.,.गैरजिम्मेदार,.. ठहाके लगाके हंसने वाली ,..,गलतियों से सीखने वाली ,.. बाहर की दुनिया देखकर महसूस करने वाली,..अपना खुद का निर्णय लेने वाली ...या फिर नौसिखिया ...ही बने रहने दीजिए ......उसको  औरत रुपी इंसान  ही बने रहने दीजिए ....भगवान की जगह बैठा कर उसका मानसिक शोषण बंद हो....  तभी इस महिला दिवस को मनाने की सार्थकता है  | 

वरना हर साल  फिर इधर का कॉपी-पेस्ट उधर और उधर का फॉरवर्ड मैसेज इधर भेजते रहें और इस इंटरनेट के बाजार में भेड़चाल का हिस्सा बनते रहें और  महिला दिवस का दिन मनाते रहें  | बस इतनी ही सार्थकता "8 मार्च वूमेंस डे" की रह जाएगी 



-सौम्या 

30 comments:

  1. बिलकुल सही बात कही है , हमें कब समझ आएगा की एक दिन नहीं हर दिन हमारा है ।

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    1. Yes.. No need to portray ..
      Thanks for liking .

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  2. Behad utkristh tarike se baat kahi hai Saumya... Har din Mahila diwas।। kyuki unke bina ghar parivaar hi kya purna samaaj adhura hai.....

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  3. Behad utkristh tarike se baat kahi hai Saumya... Har din Mahila diwas।। kyuki unke bina ghar parivaar hi kya purna samaaj adhura hai.....

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  4. True and inspiring......It's about equality in all means......

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    1. Yaa . For seat in bus we portray abla nari and waise we r equal...
      Thanks jyoti dear for reading and liking .

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  5. Two points in this article are very deep. First one, women should stop jeasously with each other and society should stop portraying her as a goddess. It's necessary for women to maintain their individuality and self-respect. Nice article

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    1. Yes exactly. U got my point. it is only her who knows the difference between her position and showcase of this day . Then y to portray so much ..?
      Thanks for commenting & liking Nalini !

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  6. I agree with most of the points talked in the article. In my view women who ask for equality... and women's day gives a platform for the same in general, should actually act as equal and behave as equal in all spheres. Most of the times it's also women who discrimate themselves from other gender and alienate. Every human being is equal and one should believe and behave as equal..

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    1. Yes Parul... equality in all spheres.. But it is going to take a long time for change I think . Thanks for your comments !

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  7. Whenever you have time...do read "Lean in" book by Sheryl Sandberg

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  8. सौम्या बहोत अच्छा आर्टिकल लिखा हे तुमने हमें ही समझना और समझाना होगा

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    1. थैंक यू चाची , आपको अच्छा लगा ।

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  9. Saumya , what a mindblowing article written by you!I am so proud of you.All points are so true to the core and it's hundred percent correct that everyone is busy in forwarding the message via internet sometimes really irrelevant too and I agree that I am also doing the same.This artice I felt as an eye opener for all .The best line I liked where you mentioned "What appropriate step has been taken by anyone to help the old age people or needy women?Looking forward to read many more authentic thought from you.Keep sensitizin us!!All the best....Love..Dolly!

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    1. First of all I thank you for your mind blowing comments and honest confession. All these thoughts came in my mind while seeing msgs every year. Same story no change .. Thank you for deep reading ... Love

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  10. Tumhare vichar un sabhi nariyo ke vichar hai jo apney swabhiman ko bacha kar rakhna janti hai...... I wish ki tumhare ye vichar un ladies ke swabiman ko jaga sake jo is bhed-chall mai fass gayi hai

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    1. Thanks Kalpana di !! Hope ki Aisa ho to mera likhna saarthak ho jayega . Thanks di for appreciating .

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  11. आज कल यही ट्रेंड है कि सोच किसी की भी हो हम बिन सोचे कट पेस्ट करके अपनी सोच भी वही करलेंगे इस फैशन मैं हम काही सबसे पीछे न रहे ,जाये हम भी मॉडर्न है ,ये बात सबको बतायेगे ।

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    1. Very well said Sandhu ! ज़्यादातर तो देखादेखी है यहाँ
      Thanks for liking and reading

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  12. सौम्या बेहद उम्दा आर्टिकल लिखा है आपने... बस इसलिए तारीफ़ नहीं कर रहा क्योंकि आप महिला हैं.. बल्कि ये बाज़ारीकरण वाला विचार मेरे दिमाग में भी कुलबुलाता रहता है.. अब फुरसत ही कहाँ किसी अहसासों को समझने की.. गुलामी है सोशल मीडिया की... आजकल तो बिना पढे ही मसग डिलीट करने पड़ते हैं किसी दिवस के...

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    1. जी अभिषेक, हर चीज का दौर आता है आज से 200 साल पहले मोबाइल फोंस की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था और आज हम इसके गुलाम बन गए... लगता है इसके बाद उकताहट का दौर आएगा,thanks4reading & liking.

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  13. बेहद खूबसूरत आलेख की बधाई। उससे भी बढ़कर इस बात के लिए साधुवाद कि आपने स्त्री विमर्श की चर्चा बड़े ही बेलाग ढंग से की जो अमूमन देखने को नहीं मिलता। आपने उस विषय को शिद्दत से छुआ है, जो हमारी चर्चा का विषय है लेकिन मंथन का विषय कब बनेगा, कोई नहीं जानता। बहरहाल, आपको शुभकामनाएं।

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    1. धन्यवाद Rj शेखर जी!आप का कमेंट करना ही मेरे लिए कॉन्प्लीमेंट के समान है उस पर से तारीफ..सोने पे सुहागा !! Thanks for reading n liking.

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    2. Thanks for the response and wishes for your next article..

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  14. बहुत सही लिखा है सौम्या
    पर जहाँ तक कॉपी पेस्ट की बात है वो आदत हो गई है कई लोंगो की जो निरर्थक है
    महिलाओं के संम्मान अधिकार और महत्व का गुणगान करने वालो को ये सभी बाते विचारो मे नहीं व्यवहार मे उतारना चाहिए

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    1. Yes , you got my point . सिर्फ़ गुणगान से काम नहीं होगा .... सोच बदलनी होगी ।
      Thanks for appreciating

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  15. Mai kafi had tak tumhari baat se sahmat hoo..aurat ko mahan banane ki zaroorat nahi hi bas use bhi ek aam insaan bane rahne dijiye..jise apni marzi se sochane aur apni marzi ke faisle lene ki azadi ho..zada kuchh kaha manga hi..

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  16. Thanks shubhra ! Bass yahi baat ..ki use b apni tarah samjha jaye ...
    Thanks for liking n comment dear.

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